पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी किन्हीं दो परिकल्पनाओं का वर्णन करें।
Q.पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी किन्हीं दो परिकल्पनाओं का वर्णन करें।
Ans. 1916 ई. में इटली के महान वैज्ञानिक गैलीलियो ने सिद्ध कर दिखाया कि सूर्य केन्द्र में स्थिर है और पृथ्वी, मंगल, बुध आदि सभी ग्रह उसकी परिक्रमा कर रहे हैं। और इसके उपरान्त सौर मण्डल के जन्म सम्बन्धी अनेक विचार प्रस्तुत किये गये और नये विचार अब भी प्रस्तुत किय जा रहे हैं क्योंकि सौर मण्डल की उत्पत्ति के वास्तविक तथ्य को शायद अभी तक मनुष्य नहीं जान पाया है। यहाँ कुछ विद्वानों के विचार संक्षेप में दिये जा रहे हैं-
1. कांट की वायव्य-राशि परिकल्पना (Gaseous Hypothesis fo Kant) - यह परिकल्पना कांट नामक जर्मन दार्शनिक ने 1755 ई० में लोगों के सम्मुख रखी। इस परिकल्पना में न्यूटन के गुरुत्वीय बल का भी ध्यान रखा गया है। कांट वैज्ञानिक के अनुसार आकाश में आदिकालीन पदार्थ कठोर और ठण्डे थे। आदिकालीन पदार्थ (Primordial Matter) के परस्पर टकरा जाने के कारण गर्मी उत्पन्न हो गई और टकरा जाने के कारण ही उन्होंने घूमना भी प्रारंभ कर दिया। इसी प्रकार एक निहारिका का रूप बन गया। घूर्णन करती निहारिका के विषुवत रेखीय भाग में वलयों का निर्माण हुआ, जो कि क्रमशः संग्रहित होकर ग्रह बने । आदिकालीन पदार्थों के टकराने का कारण गुरुत्वीय बल कहा गया है।
2. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebulary pothesis of Laplace)- यह परिकल्पना लाप्लास नामक गणितज्ञ द्वारा 1796 ई० में प्रस्तुत की गई थी। इसने कांट की भाँति आदिकालीन पदार्थ के उत्पादन मानने की त्रुटि नहीं की। लाप्लास के अनुसार आकाश में एक गर्म गैस का घूमता हुआ निहारिका धीरे-धीरे ठण्डा होने लगा। ठण्डा होते हुये संकुचित हुआ तथा उसका घूमना और भी गतिमय हो गया। घूर्णन अधिक बढ़ने से अपकेन्द्रीय शक्ति (Centrifugal force) भी अधिक बढ़ गई। इस शक्ति का विषुवत रेखा पर गुरुत्वीय बल से सन्तुलन हो जाने के कारण विषुवत रेखा के समीप का पदार्थ भारहीन हो गया। इस कार्य को लाप्लास ने बहुत सरलता से समझाया है। अपकेन्द्र बल के द्वारा घूमता हुआ पदार्थ मध्य की और एकत्र होकर बाहर जाना चाहता है। गुरुत्वाकर्षण द्वारा यह पदार्थ भीतर की ओर खींचा जाता है। अन्त में उस पदार्थ का भारहीन हो जाना प्राकृतिक हो गया। इस प्रकार की स्थिति पहुँचने पर विम्वरूपी वलय (ring) का निर्माण हुआ। वलय के बनने के पश्चात भी मध्य का निहारिका ठण्डा होकर सिकुड़ता गया। वह वलय स्वयं सिकुड़कर ग्रह बन गया। इस प्रकार ग्रह के अनन्तर ग्रह बनते गये जो गर्म गैस के गोले थे। इस गोले से फिर उसी नियम का अनुसरण हुआ और उपग्रह बने । मध्य का अतिरिक्त पदार्थ सूर्य बना। यह निहारिका साधारण विधि से वास्तविकता का अनुमान कराती है। सौर मण्डल के अधिकांश अंग घूर्णन और परिक्रमण करते हैं तथा उनकी कक्षा (orbit) भी लगभग एक समान है।
निहारिका परिकल्पना के द्वारा यह विश्वास किया गया है कि पृथ्वी पहले गैस का गोला था फिर उण्डी हुई और अन्त में अधिक ठण्डी होकर पृथ्वी ने ठोस रूप से लिया। यह प्रमाण बहुत कुछ सत्य प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी ऊपर से ठोस भी प्रतीत होती है और गहराई में जाने पर ताप बढ़ जाता है तब तरल प्रतीत होती है। इस प्रकार ज्वालामुखी क्रिया के समय पिघला लावा बाहर निकलता हुआ पाया जाता है। परन्तु अन्य वैज्ञानिकों द्वारा पृथ्वी का मध्य भाग ठोस सिद्ध किया गया है अन्यथा ज्वार उठता और भूपटल पर वर्तमान शान्ति न होती। अतः पृथ्वी को प्रारम्भ से ही ठोस मानकर कुछ वैज्ञानिकों ने अपने परिकल्पना प्रस्तुत की है। परन्तु कुछ वैज्ञानिक पृथ्वी को तरल मानकर ही चलते हैं।
लाप्लास के द्वारा प्रस्तुत निहारिका परिकल्पना पर अब कम विश्वास किया जाता है। लाप्लास ने परिकल्पना को केवल अल्प शब्दों में रखा और स्वयं अधिक महत्व नहीं दिया।